तीर्थों का भांजा, यहां स्नान के बाद पूरी होती है चारधाम की यात्रा

राजस्थान के धौलपुर में भादवा माह में शुक्ल पक्ष की पंचमी और षष्ठी को मचकुंड (मच्छकुंड) का लक्खी मेला आयोजित होता है। यानि गणेश चतुर्थी के दूसरे दिन यह मेला साधु-संतों के शाही स्नान के शुरु होता है।

इस मेले में राजस्थान, उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश से साधु-संत और भक्त शामिल होते है। कुंभ के मेले की तरह साधु-संत शाही सवारी निकालते है। वे यहां गणेश चतुर्थी के दूसरे दिन यानि ऋषि पंचमी को स्नान करते है और उसके बाद यहां मेले के आगाज होता है। जो देव छठ तक चलता है। 

मान्यता है कि मचकुंड सरोवर में देवछठ के दिन स्नान करने से पुण्य मिलता है। ऐसे में इस दिन यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु स्नान के लिए पहुंचते है। मचकुंड स्नान के बारे में यह भी मान्यता है कि यहां स्नान के बाद ही चारों धाम की तीर्थयात्रा पूरी होती है। इस धाम को तीर्थों का भांजा भी कहा जाता है। 

मचकुंड की कहानी 

 
मचकुंड मेले के आयोजन को लेकर कहा जाता है कि देवासुर संग्राम के बाद धरती पर राक्षस कालयवन के अत्याचार बढ़ने लगे। सभी परेशान हो उठे और वे भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुंचे।

तब भगवान श्री कृष्ण भक्तों की रक्षा के लिए आगे आए और उन्होंने कालयवन राक्षस से युद्ध किया, लेकिन वे हार गए। तब लीलाधर श्रीकृष्ण ने छल से मचकुंड नामक संत के माध्यम से कालयवन का वध कराया। जिसके बाद कालयवन के अत्याचारों से यह धरती मुक्त हो गई। उसके वध के बाद से आज तक यहां पर मचकुंड की तपोभूमि पर स्नान पर्व आयोजित होता है। 
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